Thursday, 9 July 2026

LECTURE–3 CIVIL PROCEDURE CODE-1908 /What is Justice?

 


Before We Open the Bare Act

LECTURE–3 CIVIL PROCEDURE CODE-1908 

What is Justice?

न्याय आखिर है क्या?

"Justice is not merely about giving a decision; it is about giving the right decision through the right process."

"न्याय केवल निर्णय देने का नाम नहीं है; न्याय सही प्रक्रिया अपनाकर सही निर्णय देने का नाम है।"

किसी भी विधि का अंतिम उद्देश्य न्याय (Justice) है। न्यायालयों की स्थापना, विधियों का निर्माण, न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था का अस्तित्व इसी एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए है। फिर भी यदि किसी सामान्य व्यक्ति से पूछा जाए कि न्याय क्या है, तो अधिकांश लोग सरल शब्दों में उत्तर देंगे—"जिसे उसका अधिकार मिल जाए, वही न्याय है।" यह उत्तर आंशिक रूप से सही अवश्य है, किन्तु न्याय की संपूर्ण अवधारणा इससे कहीं अधिक व्यापक है।

विधिक दृष्टि से न्याय केवल किसी विवाद का परिणाम (Result) नहीं है, बल्कि उस परिणाम तक पहुँचने की निष्पक्ष, पारदर्शी और विधिसम्मत प्रक्रिया (Fair, Transparent and Lawful Procedure) भी है। यदि सही परिणाम अनुचित प्रक्रिया से प्राप्त किया गया हो, तो कानून उसे आदर्श न्याय नहीं मानता। यही कारण है कि Code of Civil Procedure, 1908 (CPC) का अध्ययन न्याय की अवधारणा को समझे बिना अधूरा माना जाएगा।

इस विचार को एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए दो बच्चे—मोहन और सोहन—मिलकर एक आम तोड़ते हैं। दोनों उस आम पर अपना-अपना अधिकार जताते हैं और विवाद अपनी माता के पास लेकर पहुँचते हैं। यदि माता बिना किसी से कुछ पूछे आम केवल मोहन को दे दे, तो क्या इसे न्याय कहा जाएगा? स्पष्ट रूप से नहीं। कारण यह नहीं कि निर्णय अवश्य ही गलत है, बल्कि इसलिए कि निर्णय देने से पूर्व दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर ही नहीं दिया गया। न्याय का पहला सिद्धान्त यही है कि किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला निर्णय उसके पक्ष को सुने बिना नहीं दिया जाना चाहिए।

इसी सिद्धान्त को आगे चलकर प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के प्रसिद्ध नियम Audi Alteram Partem के रूप में अभिव्यक्त किया गया, जिसका अर्थ है—"दूसरे पक्ष को भी सुनो।" आधुनिक न्याय व्यवस्था का यह आधारभूत सिद्धान्त है और सिविल प्रक्रिया संहिता की अनेक धाराओं तथा आदेशों में इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देता है।

एक अन्य उदाहरण इस अवधारणा को और अधिक स्पष्ट करता है। कल्पना कीजिए कि किसी विद्यार्थी ने वार्षिक परीक्षा में 95 अंक प्राप्त किए हैं, किन्तु परिणाम-पत्र में भूलवश केवल 35 अंक अंकित कर दिए गए। विद्यार्थी प्रधानाचार्य से पुनः जाँच का अनुरोध करता है, परन्तु बिना उत्तर-पुस्तिका देखे ही उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में केवल परिणाम ही नहीं, बल्कि परिणाम तक पहुँचने की प्रक्रिया भी प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। यदि तथ्य (Facts) की जाँच ही नहीं की गई, तो निर्णय की विश्वसनीयता कैसे स्वीकार की जा सकती है?

यही कारण है कि विधि न्याय को केवल अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखती। न्याय तभी सार्थक माना जाता है जब वह निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त हुआ हो। इसी विचार को अंग्रेज़ी विधिशास्त्र में एक अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धान्त के रूप में व्यक्त किया गया है—

Justice should not only be done, but should also be seen to be done.

अर्थात् न्याय केवल किया जाना पर्याप्त नहीं है; यह भी स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए कि न्याय निष्पक्ष, पारदर्शी और विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया है।

यहीं पर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है—क्या कानून (Law) और न्याय (Justice) सदैव एक ही बात हैं?

आदर्श रूप से प्रत्येक विधि का उद्देश्य न्याय की स्थापना करना होता है। किन्तु न्याय तक पहुँचने के लिए कानून कुछ निश्चित प्रक्रियाएँ निर्धारित करता है। इसलिए न्यायालय केवल यह नहीं देखता कि कौन सही है और कौन गलत। वह यह भी सुनिश्चित करता है कि वाद विधि के अनुसार संस्थित (Instituted) किया गया है या नहीं, प्रतिवादी को समुचित सूचना (Notice) दी गई है या नहीं, दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर प्राप्त हुआ है या नहीं तथा निर्णय विधिसम्मत साक्ष्यों (Admissible Evidence) के आधार पर दिया जा रहा है या नहीं। यही प्रक्रियात्मक अनुशासन न्यायिक निर्णयों को विश्वसनीय और स्वीकार्य बनाता है।

इसी संदर्भ में न्यायिक सोच (Judicial Thinking) और सामान्य सोच (Ordinary Thinking) के बीच का अंतर भी समझना आवश्यक है। सामान्य व्यक्ति किसी विवाद को देखकर प्रायः यह पूछता है—"गलती किसकी है?" इसके विपरीत एक न्यायाधीश का दृष्टिकोण भिन्न होता है। वह सर्वप्रथम उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण करता है, उसके बाद यह देखता है कि लागू होने वाला कानून क्या है, और अंत में यह सुनिश्चित करता है कि संपूर्ण प्रक्रिया विधि के अनुरूप अपनाई गई है या नहीं। न्यायालय की निष्पक्षता का आधार यही न्यायिक दृष्टिकोण है।

न्यायिक सेवा परीक्षाओं में भी इस मूलभूत अवधारणा से संबंधित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। उदाहरणार्थ—

Which one of the following is the foundation of Justice?

(a) Speed
(b) Popular Opinion
(c) Fair Procedure
(d) Personal Belief

Correct Answer: (c) Fair Procedure

इस अध्याय का मूल संदेश यह है कि न्याय केवल सही परिणाम प्राप्त करने का नाम नहीं है। न्याय वह प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक पक्ष को सुनवाई का समान अवसर प्राप्त हो, तथ्य निष्पक्ष रूप से परखे जाएँ, विधि का पालन किया जाए और उसके पश्चात् उचित निर्णय दिया जाए। यही कारण है कि Code of Civil Procedure, 1908 केवल मुकदमों के संचालन का तकनीकी कानून नहीं है; यह निष्पक्ष न्याय (Fair Justice) सुनिश्चित करने वाली प्रक्रियाओं का संहिता (Code) है।

अब जबकि हमने न्याय की मूल अवधारणा को समझ लिया है, अगला स्वाभाविक प्रश्न यह है कि सभी प्रकार के विवाद एक जैसे क्यों नहीं होते। अगले अध्याय में हम Civil Law और Criminal Law के बीच के मूलभूत अंतर का अध्ययन करेंगे और समझेंगे कि Code of Civil Procedure केवल दीवानी (Civil) मामलों पर ही क्यों लागू होती है।

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