Thursday, 18 June 2026

भारत–जापान संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) और कार्बन बाज़ार : जलवायु सहयोग का नया अध्याय/India–Japan Joint Crediting Mechanism (JCM) and Carbon Markets: A New Era of Climate Cooperation

 

भारतजापान संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) और कार्बन बाज़ार : जलवायु सहयोग का नया अध्याय

इक्कीसवीं शताब्दी में मानवता जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, उनमें जलवायु परिवर्तन सबसे गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ता वैश्विक तापमान, पिघलते हिमनद, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और जैव-विविधता का ह्रास न केवल पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि विश्व की अर्थव्यवस्थाओं और समाजों के लिए भी संकट उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में विश्व समुदाय ऐसे उपायों की खोज कर रहा है जो आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सकें।

इसी दिशा में कार्बन बाज़ार (Carbon Markets) तथा भारतजापान संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (Joint Crediting Mechanism – JCM) एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आए हैं। हाल ही में भारत और जापान ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के अंतर्गत JCM के कार्यान्वयन नियमों को अपनाया है, जो दोनों देशों के बीच जलवायु सहयोग के एक नए युग का संकेत देता है।

जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन की समस्या

पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहती हैं। ये गैसें सूर्य की ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को जीवन के अनुकूल तापमान प्रदान करती हैं। किन्तु औद्योगिक क्रांति के बाद मानव गतिविधियों के कारण इन गैसों की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई और औद्योगिक उत्पादन ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचा दिया है। परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है जिसे हम वैश्विक तापन (Global Warming) कहते हैं।

कार्बन बाज़ार क्या हैं?

कार्बन बाज़ार एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें कार्बन उत्सर्जन को एक मूल्यवान वस्तु के रूप में देखा जाता है। इसका मूल सिद्धांत है कि यदि कोई देश, उद्योग या संस्था निर्धारित लक्ष्य से अधिक उत्सर्जन में कमी करती है, तो उसे कार्बन क्रेडिट प्राप्त होते हैं। ये कार्बन क्रेडिट उन देशों या कंपनियों को बेचे जा सकते हैं जो अपने उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। अर्थात् कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने वालों को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है और प्रदूषण कम करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

कार्बन बाज़ारों के प्रकार

1. अनुपालन आधारित कार्बन बाज़ार (Compliance Market)

ये सरकारों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों द्वारा नियंत्रित होते हैं। इनमें उद्योगों और कंपनियों को उत्सर्जन की एक सीमा निर्धारित की जाती है। यदि वे इस सीमा से अधिक उत्सर्जन करते हैं, तो उन्हें अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट खरीदने पड़ते हैं।

2. स्वैच्छिक कार्बन बाज़ार (Voluntary Market)

इन बाज़ारों में कंपनियाँ अपनी सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी निभाने के लिए स्वेच्छा से कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं। आज अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ "नेट-ज़ीरो" लक्ष्य प्राप्त करने के लिए स्वैच्छिक कार्बन बाज़ारों का उपयोग कर रही हैं।

कार्बन व्यापार का विकास-कार्बन व्यापार की अवधारणा पहली बार 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत व्यापक रूप से सामने आई।

क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत:

स्वच्छ विकास तंत्र (CDM)-विकसित देश विकासशील देशों में हरित परियोजनाओं में निवेश कर कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते थे।

संयुक्त कार्यान्वयन (JI)-विकसित देशों के बीच उत्सर्जन कटौती परियोजनाओं को प्रोत्साहित किया गया। हालाँकि इन व्यवस्थाओं में पारदर्शिता और लाभों के समान वितरण को लेकर कई आलोचनाएँ हुईं। इसलिए पेरिस समझौते ने अधिक व्यापक और आधुनिक व्यवस्था प्रस्तुत की।

पेरिस समझौता और अनुच्छेद 6

2015 में संपन्न पेरिस जलवायु समझौता जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विश्व का सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता माना जाता है। इसका अनुच्छेद 6 देशों के बीच स्वैच्छिक सहयोग की व्यवस्था प्रदान करता है।अनुच्छेद 6 के तीन प्रमुख भाग हैं:

अनुच्छेद 6.2-देशों के बीच कार्बन क्रेडिट के हस्तांतरण की अनुमति देता है।

अनुच्छेद 6.4-संयुक्त राष्ट्र के अधीन एक वैश्विक कार्बन बाज़ार की व्यवस्था स्थापित करता है।

अनुच्छेद 6.8-गैर-बाज़ार आधारित सहयोग जैसे तकनीकी सहायता और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देता है। भारतजापान JCM मुख्यतः अनुच्छेद 6.2 पर आधारित है।

संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) क्या है?

संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र जापान द्वारा विकसित एक द्विपक्षीय कार्बन क्रेडिट व्यवस्था है।

इसका उद्देश्य है:

  • हरित प्रौद्योगिकियों का प्रसार
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी
  • तकनीकी सहयोग को बढ़ावा
  • सतत विकास को प्रोत्साहन
  • कार्बन क्रेडिट का साझा लाभ

जापान पहले ही एशिया, अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र के अनेक देशों के साथ ऐसे समझौते कर चुका है।

JCM कैसे कार्य करता है?

सबसे पहले जापानी और भारतीय कंपनियाँ मिलकर ऐसी परियोजनाएँ स्थापित करती हैं जो कार्बन उत्सर्जन को कम करती हैं।

उदाहरण:

  • सौर ऊर्जा संयंत्र
  • पवन ऊर्जा परियोजनाएँ
  • ऊर्जा दक्ष औद्योगिक उपकरण
  • हरित हाइड्रोजन परियोजनाएँ
  • स्मार्ट ग्रिड
  • अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली

जब इन परियोजनाओं से उत्सर्जन में कमी आती है, तो स्वतंत्र विशेषज्ञ इसका सत्यापन करते हैं। सत्यापन के बाद कार्बन क्रेडिट जारी किए जाते हैं और दोनों देशों के बीच साझा किए जाते हैं।

भारत के लिए JCM का महत्व

1. उन्नत प्रौद्योगिकी की प्राप्ति

जापान विश्व के सबसे उन्नत औद्योगिक देशों में से एक है।

JCM के माध्यम से भारत को:

  • आधुनिक हरित तकनीक
  • ऊर्जा दक्ष उपकरण
  • स्वच्छ उत्पादन प्रणाली

प्राप्त हो सकती हैं।

2. जलवायु वित्त (Climate Finance)

हरित परियोजनाओं के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होती है।

जापानी निवेश भारत को:

  • कम लागत पर हरित परियोजनाएँ स्थापित करने,
  • विदेशी निवेश आकर्षित करने,
  • और नई तकनीकों को अपनाने में सहायता देगा।

3. भारत के जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति

भारत ने कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं:

  • वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार
  • कार्बन तीव्रता में कमी

JCM इन लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक सिद्ध हो सकता है।

4. भारतजापान संबंधों को मजबूती

भारत और जापान पहले से ही अनेक क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं:

  • बुलेट ट्रेन परियोजना
  • आधारभूत संरचना विकास
  • समुद्री सुरक्षा
  • हिंद-प्रशांत रणनीति

अब जलवायु सहयोग इस साझेदारी को और गहरा करेगा।

भारत में कार्बन बाज़ार की संभावनाएँ

भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। साथ ही इसमें कार्बन उत्सर्जन में कमी की अपार संभावनाएँ हैं।

विशेष रूप से:

नवीकरणीय ऊर्जा-भारत विश्व के सबसे बड़े सौर ऊर्जा बाज़ारों में से एक बन रहा है।

हरित हाइड्रोजन

राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत को वैश्विक ऊर्जा केंद्र बना सकता है।

विद्युत वाहन

ईवी क्षेत्र में तीव्र वृद्धि कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकती है।

टिकाऊ कृषि

जलवायु-स्मार्ट कृषि कार्बन अवशोषण और ग्रामीण विकास दोनों में योगदान दे सकती है।

 

चुनौतियाँ-यद्यपि कार्बन बाज़ार आशाजनक हैं, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

अतिरिक्तता (Additionality)-यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि परियोजना वास्तव में अतिरिक्त उत्सर्जन कटौती कर रही हो।

दोहरी गणना (Double Counting)-एक ही उत्सर्जन कटौती का लाभ दो देशों द्वारा नहीं लिया जाना चाहिए।

पारदर्शिता-विश्वसनीय निगरानी और सत्यापन व्यवस्था आवश्यक है।

न्यायसंगतता-विकासशील देशों के हितों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

भारतजापान संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र केवल एक पर्यावरणीय समझौता नहीं है, बल्कि यह सतत विकास, आर्थिक प्रगति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह व्यवस्था भारत को उन्नत प्रौद्योगिकी, जलवायु वित्त और कार्बन बाज़ारों तक पहुँच प्रदान करेगी, जबकि जापान को अपने वैश्विक जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता मिलेगी।

आने वाले वर्षों में कार्बन बाज़ार वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहे हैं। ऐसे में भारतजापान JCM न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए जलवायु सहयोग का एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है।

परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु (Quick Revision)

  • JCM = Joint Crediting Mechanism (संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र)
  • आधार = पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6.2
  • उद्देश्य = कार्बन उत्सर्जन में कमी और कार्बन क्रेडिट का साझा लाभ
  • भारत का नेट-ज़ीरो लक्ष्य = 2070
  • कार्बन बाज़ार = उत्सर्जन में कमी के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रणाली
  • मुख्य लाभ = हरित प्रौद्योगिकी, जलवायु वित्त, सतत विकास
  • UPSC/HCS के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण समसामयिक विषय

 

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