ग़ज़ल
"फ़साना न छेड़ फिर"
ऐ बाद-ए-सबा, दिल का फ़साना न छेड़ फिर,
दफ़्ना चुका हूँ जिनको, वो अफ़साना न छेड़ फिर।
गुज़रे हुए दिनों की वो गर्द-ए-राह-ए-इश्क़,
महफ़ूज़ हैं ख़मोश, उन्हें फिर से न छेड़ फिर।**
अश्कों की हर इक बूंद में सदियों का दर्द है,
ऐ चश्म-ए-तर, वो ख़्वाब सुहाना न छेड़ फिर।**
दिल था कि एक शीशा-ए-नाज़ुक वफ़ा के नाम,
अब ख़ाक हो चुका है, उसे फिर से न छेड़ फिर।**
उस बेनियाज़ हुस्न को क्या इल्म-ए-दर्द था,
उसकी जफ़ाओं का कोई किस्सा न छेड़ फिर।**
हर आह बन गई है शरर रात-दिन यहाँ,
इस सोज़-ए-जाँ का और तराना न छेड़ फिर।**
तूफ़ान-ए-ग़म से बच के जो साहिल पे आ लगा,
उस कश्ती-ए-शिकस्ता को दरिया न छेड़ फिर।**
जो कुछ था मेरे पास, ज़माने ने ले लिया,
अब ज़िक्र-ए-रफ़्ता, ज़िक्र-ए-तमन्ना न छेड़ फिर।**
मुद्दत हुई कि इश्क़ को रुख़्सत किए हुए,
ऐ दिल, किसी हसीं का ख़याल आ न छेड़ फिर।**
'फरहत ' अब तो सब्र की चादर में है पनाह,
इस ख़स्तगी में दर्द का दरिया न छेड़ फिर।**
प्रमोद "फरहत करनालवी "
कुछ शब्दों का अर्थ
बाद-ए-सबा – प्रातःकालीन शीतल हवा
गर्द-ए-राह-ए-इश्क़ – प्रेम के मार्ग की धूल (बीती यादें)
चश्म-ए-तर – अश्कों से भीगी आँख
शीशा-ए-नाज़ुक – कोमल काँच
बेनियाज़ – जिसे किसी की परवाह न हो
जफ़ा – बेवफ़ाई, अत्याचार
सोज़-ए-जाँ – आत्मा की जलन, आंतरिक पीड़ा
कश्ती-ए-शिकस्ता – टूटी हुई नाव
ज़िक्र-ए-रफ़्ता – बीते हुए दिनों का स्मरण
ख़स्तगी – टूटन, थकान, घायल अवस्था

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