Friday, 26 June 2026

Ghazal-"फ़साना न छेड़ फिर"

                                                                          ग़ज़ल


"फ़साना न छेड़ फिर"

ऐ बाद-ए-सबा, दिल का फ़साना न छेड़ फिर,

दफ़्ना चुका हूँ जिनको, वो अफ़साना न छेड़ फिर।

गुज़रे हुए दिनों की वो गर्द-ए-राह-ए-इश्क़,

महफ़ूज़ हैं ख़मोश, उन्हें फिर से न छेड़ फिर।**

अश्कों की हर इक बूंद में सदियों का दर्द है,

ऐ चश्म-ए-तर, वो ख़्वाब सुहाना न छेड़ फिर।**

दिल था कि एक शीशा-ए-नाज़ुक वफ़ा के नाम,

अब ख़ाक हो चुका है, उसे फिर से न छेड़ फिर।**

उस बेनियाज़ हुस्न को क्या इल्म-ए-दर्द था,

उसकी जफ़ाओं का कोई किस्सा न छेड़ फिर।**

हर आह बन गई है शरर रात-दिन यहाँ,

इस सोज़-ए-जाँ का और तराना न छेड़ फिर।**

तूफ़ान-ए-ग़म से बच के जो साहिल पे आ लगा,

उस कश्ती-ए-शिकस्ता को दरिया न छेड़ फिर।**

जो कुछ था मेरे पास, ज़माने ने ले लिया,

अब ज़िक्र-ए-रफ़्ता, ज़िक्र-ए-तमन्ना न छेड़ फिर।**

मुद्दत हुई कि इश्क़ को रुख़्सत किए हुए,

ऐ दिल, किसी हसीं का ख़याल आ न छेड़ फिर।**

'फरहत ' अब तो सब्र की चादर में है पनाह,

इस ख़स्तगी में दर्द का दरिया न छेड़ फिर।**

प्रमोद "फरहत करनालवी "


कुछ शब्दों का अर्थ

बाद-ए-सबा – प्रातःकालीन शीतल हवा

गर्द-ए-राह-ए-इश्क़ – प्रेम के मार्ग की धूल (बीती यादें)

चश्म-ए-तर – अश्कों से भीगी आँख

शीशा-ए-नाज़ुक – कोमल काँच

बेनियाज़ – जिसे किसी की परवाह न हो

जफ़ा – बेवफ़ाई, अत्याचार

सोज़-ए-जाँ – आत्मा की जलन, आंतरिक पीड़ा

कश्ती-ए-शिकस्ता – टूटी हुई नाव

ज़िक्र-ए-रफ़्ता – बीते हुए दिनों का स्मरण

ख़स्तगी – टूटन, थकान, घायल अवस्था

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