**इथेनॉल की राजनीति या ऊर्जा क्रांति?
जनता के मन में उठते प्रश्नों का उत्तर कौन देगा?**
भारत आज ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) के ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ केवल ईंधन नहीं बदल रहा, बल्कि पूरी आर्थिक, कृषि और औद्योगिक नीति का स्वरूप बदलने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि आने वाले वर्षों में भारत को कच्चे तेल के आयात पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी, किसानों को अतिरिक्त आय के स्रोत उपलब्ध कराने होंगे, प्रदूषण कम करना होगा और देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना होगा। इसी व्यापक दृष्टिकोण के अंतर्गत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20), फ्लेक्स-फ्यूल इंजन और वैकल्पिक ईंधनों को भविष्य का मार्ग बताया जा रहा है। यदि केवल नीति के उद्देश्यों को देखा जाए तो शायद ही कोई भारतीय होगा जो इस दिशा का विरोध करेगा। कौन नहीं चाहेगा कि देश का लाखों करोड़ रुपये का आयात कम हो, किसानों की आय बढ़े और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे? लेकिन लोकतंत्र में किसी नीति का मूल्यांकन केवल उसके उद्देश्य से नहीं होता, बल्कि उसके क्रियान्वयन, उसके प्रभाव और सबसे बढ़कर जनता के विश्वास से होता है। आज इथेनॉल नीति उसी विश्वास की कसौटी पर खड़ी दिखाई देती है।
पिछले कई वर्षों से यदि कोई मंत्री इथेनॉल, बायोफ्यूल और वैकल्पिक ऊर्जा का सबसे बड़ा सार्वजनिक चेहरा बनकर उभरा है तो वह सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी हैं। उन्होंने अनेक मंचों से कहा कि भारत का भविष्य वैकल्पिक ईंधनों में है। उन्होंने फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की वकालत की, 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाले इंजनों की चर्चा की, स्वयं ऐसी गाड़ी चलाने का दावा किया और यहाँ तक कहा कि भविष्य में ईंधन की प्रभावी लागत इतनी कम हो सकती है कि आज जिस दूरी को तय करने के लिए नागरिक ₹120 प्रति लीटर वाले पेट्रोल पर निर्भर है, वही दूरी लगभग ₹15 से ₹25 प्रति लीटर की लागत वाले इथेनॉल आधारित ईंधन से तय की जा सकेगी। उनके इन वक्तव्यों ने करोड़ों भारतीयों के मन में आशा भी जगाई और अपेक्षाएँ भी पैदा कीं।
किन्तु आज जनता का पहला प्रश्न यही है कि यदि यह तकनीक इतनी क्रांतिकारी थी तो उसका प्रत्यक्ष लाभ आम नागरिक को अभी तक क्यों दिखाई नहीं दे रहा? पेट्रोल की कीमतें आज भी आम परिवार के मासिक बजट पर भारी पड़ती हैं। ई20 मिश्रित पेट्रोल पूरे देश में उपलब्ध है, परंतु आम उपभोक्ता को यह अनुभव नहीं हो रहा कि उसके ईंधन खर्च में कोई क्रांतिकारी कमी आई है। सरकार का तर्क है कि उद्देश्य पेट्रोल सस्ता करना नहीं बल्कि आयात कम करना और किसानों को लाभ पहुँचाना है। दूसरी ओर जनता कहती है कि सार्वजनिक मंचों पर जिस प्रकार भविष्य की तस्वीर प्रस्तुत की गई थी, उससे यह धारणा बनी कि सामान्य उपभोक्ता को भी शीघ्र आर्थिक राहत मिलेगी। लोकतंत्र में समस्या तब उत्पन्न होती है जब सरकार का आशय और जनता की समझ अलग-अलग दिशाओं में चली जाए।
इसी के साथ एक दूसरा प्रश्न भी लगातार जनचर्चा का विषय बना हुआ है। भारत सरकार में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय एक स्वतंत्र मंत्रालय है जिसके पास पेट्रोल, डीज़ल, गैस, इथेनॉल मिश्रण नीति तथा तेल विपणन कंपनियों से संबंधित सभी प्रशासनिक और नीतिगत अधिकार हैं। फिर भी इथेनॉल पर सबसे अधिक सार्वजनिक वक्तव्य सड़क परिवहन मंत्री की ओर से क्यों आते हैं? पेट्रोलियम मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी भी समय-समय पर नीति का पक्ष रखते हैं, परंतु आम जनता की दृष्टि में इथेनॉल अभियान का चेहरा अधिकतर नितिन गडकरी ही दिखाई देते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया, यूट्यूब और जनचर्चाओं में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि क्या यह केवल वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने का प्रयास है अथवा परिवहन मंत्रालय इस विषय में सामान्य प्रशासनिक सीमाओं से अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहा है? यह प्रश्न तथ्य से अधिक जनधारणा का विषय है, लेकिन लोकतंत्र में जनधारणा की उपेक्षा कभी नहीं की जा सकती।
आज यूट्यूब, फेसबुक, एक्स (पूर्व ट्विटर) और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर हजारों वीडियो उपलब्ध हैं जिनमें लोग इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। कोई कहता है कि उसकी कार का माइलेज पहले से कम हो गया है। कोई दावा करता है कि इंजन का प्रदर्शन बदल गया है। कुछ लोग सर्विस सेंटरों के कर्मचारियों के कथित अनुभवों का हवाला देते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि आधुनिक इंजन E20 के लिए तैयार हैं, जबकि पुराने वाहनों में समस्याएँ आ सकती हैं। इन सभी दावों की वैज्ञानिक सत्यता अलग विषय हो सकती है, परंतु यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि लाखों भारतीय इन चर्चाओं को सुन रहे हैं और उन्हीं के आधार पर अपनी राय बना रहे हैं। लोकतंत्र में नीति केवल प्रयोगशाला में नहीं चलती; वह जनता के मन में भी चलती है।
यही वह बिंदु है जहाँ सरकार और जनता के बीच संवाद कमजोर पड़ता हुआ दिखाई देता है। सरकार बार-बार यह कहती है कि इथेनॉल से विदेशी मुद्रा की बचत हुई, किसानों को लाखों करोड़ रुपये का भुगतान हुआ, कार्बन उत्सर्जन कम हुआ और आयातित तेल पर निर्भरता घट रही है। ये सभी दावे राष्ट्रीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। परंतु दूसरी ओर एक मध्यमवर्गीय नागरिक पूछता है—"यदि देश को इतना लाभ हुआ है तो मेरी जेब को उसका लाभ कब मिलेगा?" एक किसान पूछता है—"क्या वास्तव में इथेनॉल का लाभ हर किसान तक पहुँचा है या केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित है?" एक वाहन स्वामी पूछता है—"यदि माइलेज में थोड़ी भी कमी आती है तो उसका आर्थिक भार कौन वहन करेगा?" इन प्रश्नों का उत्तर केवल आँकड़ों से नहीं, बल्कि विश्वास से दिया जा सकता है।
नितिन गडकरी स्वयं यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि उनके परिवार की चीनी मिल में इथेनॉल एक उप-उत्पाद के रूप में बनता है। उन्होंने अनेक साक्षात्कारों में स्पष्ट कहा है कि देश में लगभग 450 से 500 इथेनॉल उत्पादक इकाइयाँ हैं, उनके परिवार की इकाई कुल उत्पादन का बहुत छोटा हिस्सा है, मूल्य निर्धारण पेट्रोलियम मंत्रालय करता है, खरीद प्रक्रिया निविदा के माध्यम से होती है और किसी प्रकार का विशेष लाभ उन्हें प्राप्त नहीं होता। यह उनका आधिकारिक पक्ष है और लोकतांत्रिक विमर्श में उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
किन्तु यहाँ एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है। शासन केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं है; शासन को निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। यदि लाखों नागरिक सोशल मीडिया पर यह प्रश्न उठा रहे हैं कि जिस नीति का सबसे बड़ा समर्थक एक ऐसा मंत्री है जिसके परिवार का व्यवसाय उसी उद्योग से किसी रूप में जुड़ा रहा है, तो सरकार का दायित्व और बढ़ जाता है कि वह अधिकतम पारदर्शिता स्थापित करे। हो सकता है कि वास्तविकता पूरी तरह अलग हो, परंतु लोकतंत्र में वास्तविकता जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही महत्वपूर्ण होती है सार्वजनिक धारणा।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि सरकारें अक्सर विरोधियों से नहीं, बल्कि जनता की बदलती हुई धारणाओं से पराजित होती हैं। किसी नीति का सबसे बड़ा शत्रु विपक्ष नहीं होता; सबसे बड़ा शत्रु विश्वास का संकट होता है। यदि जनता यह महसूस करने लगे कि उसके प्रश्नों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, तो सबसे उत्कृष्ट नीति भी संदेह के घेरे में आ जाती है। यही कारण है कि इथेनॉल पर आज केवल वैज्ञानिक बहस पर्याप्त नहीं है; उससे कहीं अधिक आवश्यक है सार्वजनिक विश्वास का निर्माण।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि सरकार आलोचकों को उत्तर दे; आवश्यकता इस बात की है कि सरकार जनता को उत्तर दे। यदि इथेनॉल वास्तव में भविष्य का ईंधन है, यदि यह पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए लाभकारी है, यदि आधुनिक इंजन इसके लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं, तो सरकार को स्वतंत्र तकनीकी संस्थानों, वाहन निर्माताओं, भारतीय ऑटोमोटिव अनुसंधान संस्थानों और उपभोक्ता संगठनों की संयुक्त रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। जनता को यह बताना चाहिए कि किन वाहनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है, किन परिस्थितियों में माइलेज घट सकता है, किन परिस्थितियों में नहीं, और भविष्य का रोडमैप क्या है। विश्वास आदेश से नहीं, पारदर्शिता से पैदा होता है।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा सत्य यही है कि जनता केवल वोट नहीं देती, वह धारणा भी बनाती है। वही धारणा किसी नेता को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में स्थान देती है और वही धारणा किसी सफल नीति को भी विवाद का विषय बना सकती है। इसलिए इथेनॉल की वास्तविक परीक्षा प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों नागरिकों के मन में होगी। जिस दिन जनता यह विश्वास कर लेगी कि यह नीति वास्तव में उसके हित में है, उस दिन किसी प्रचार अभियान की आवश्यकता नहीं रहेगी। और यदि जनता का विश्वास डगमगा गया, तो सबसे शक्तिशाली तर्क भी उसे वापस नहीं ला पाएंगे।
संदर्भ (Public Statements & Public Discourse):
- नितिन गडकरी का साक्षात्कार (इथेनॉल, फ्लेक्स-फ्यूल एवं ₹15–₹25 लागत संबंधी वक्तव्य): https://www.youtube.com/watch?v=jEi0Wl0OFgE
- हरदीप सिंह पुरी का इथेनॉल एवं E20 पर वक्तव्य: https://www.youtube.com/shorts/gGXw1lRmTs8
- सार्वजनिक आलोचना एवं जनधारणा से संबंधित यूट्यूब चर्चाएँ (जनमत के उदाहरण, तथ्य का अंतिम प्रमाण नहीं):
नोट: इस लेख में जहाँ सरकारी दावों का उल्लेख है, वे संबंधित मंत्रियों के सार्वजनिक बयानों पर आधारित हैं। जहाँ जनता की प्रतिक्रियाओं का उल्लेख है, वे सोशल मीडिया एवं यूट्यूब जैसे सार्वजनिक मंचों पर व्यक्त जनधारणाओं का विश्लेषण हैं; उन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं प्रस्तुत किया गया है।

No comments:
Post a Comment