सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 न्यायिक सेवा परीक्षा हेतु कक्षा-आधारित अध्ययन पुस्तक
BARE ACT प्रारम्भ करने से पहले
अध्याय–4,दीवानी विधि और आपराधिक विधि में अंतर
"प्रत्येक विवाद अपराध नहीं होता और प्रत्येक गलत कार्य दीवानी वाद का विषय भी नहीं होता।"
भूमिका
सिविल प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure, 1908) का अध्ययन प्रारम्भ करने से पहले प्रत्येक विधि-विद्यार्थी के मन में एक मूलभूत प्रश्न अवश्य उठना चाहिए—आखिर CPC केवल दीवानी (Civil) मामलों पर ही क्यों लागू होती है? यदि न्यायालय न्याय प्रदान करते हैं, तो क्या प्रत्येक प्रकार का विवाद एक ही न्यायालय में नहीं जाना चाहिए? यदि उत्तर 'नहीं' है, तो दीवानी और आपराधिक मामलों में ऐसा कौन-सा मौलिक अंतर है जो दोनों के लिए अलग-अलग विधियाँ और अलग-अलग प्रक्रियाएँ निर्धारित करता है?
इन प्रश्नों का उत्तर समझे बिना सिविल प्रक्रिया संहिता का अध्ययन अधूरा रहेगा। वास्तव में, किसी भी न्यायिक अधिकारी के लिए यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि प्रत्येक विधिक विवाद समान प्रकृति का नहीं होता। कुछ विवाद व्यक्तियों के निजी अधिकारों (Private Rights) से संबंधित होते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण समाज और राज्य की शांति एवं व्यवस्था पर पड़ता है। इसी आधार पर विधि ने दीवानी और आपराधिक कानून के बीच स्पष्ट विभाजन किया है।
3.1 दीवानी विधि (Civil Law) क्या है?
दीवानी विधि वह शाखा है जो व्यक्तियों के निजी अधिकारों (Private Rights) तथा उनके पारस्परिक विधिक संबंधों (Legal Relationships) का संरक्षण करती है। जब किसी व्यक्ति के संपत्ति संबंधी अधिकार, संविदात्मक अधिकार, पारिवारिक अधिकार अथवा अन्य नागरिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तब उत्पन्न विवाद का समाधान दीवानी न्यायालय के माध्यम से किया जाता है।
दीवानी न्यायालय का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दण्डित करना नहीं होता, बल्कि यह निर्धारित करना होता है कि विवादित अधिकार वास्तव में किसके पक्ष में है तथा उस अधिकार के संरक्षण हेतु किस प्रकार की विधिक राहत (Legal Relief) प्रदान की जानी चाहिए।
दीवानी न्यायालय निम्नलिखित प्रकार की राहत प्रदान कर सकता है—
- धन की वसूली (Recovery of Money)
- संपत्ति पर अधिकार की घोषणा (Declaration of Rights)
- संपत्ति का कब्ज़ा दिलाना (Recovery of Possession)
- स्थायी अथवा अस्थायी निषेधाज्ञा (Permanent or Temporary Injunction)
- संविदा का विशिष्ट पालन (Specific Performance of Contract)
- संपत्ति का विभाजन (Partition)
- क्षतिपूर्ति या हर्जाना (Damages or Compensation)
अर्थात् दीवानी विधि का मुख्य उद्देश्य अधिकारों का प्रवर्तन (Enforcement of Rights) तथा उचित राहत (Relief) प्रदान करना है।
3.2 आपराधिक विधि (Criminal Law) क्या है?
आपराधिक विधि उन कृत्यों से संबंधित है जिन्हें राज्य और समाज के विरुद्ध अपराध (Offence) माना जाता है। हत्या, चोरी, डकैती, बलात्कार, अपहरण, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात तथा अन्य दण्डनीय कृत्य केवल किसी एक व्यक्ति को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि समाज में भय, असुरक्षा और अव्यवस्था उत्पन्न करते हैं।
इसी कारण ऐसे मामलों में राज्य स्वयं अभियोजन (Prosecution) करता है और अपराधी को कानून के अनुसार दण्डित करने का प्रयास करता है।
आपराधिक न्यायालय का प्रमुख उद्देश्य है—
- अपराधी को दण्डित करना,
- समाज की सुरक्षा करना,
- अपराधों की पुनरावृत्ति को रोकना, तथा
- विधि के शासन (Rule of Law) की रक्षा करना।
अपराध सिद्ध होने पर न्यायालय कारावास, जुर्माना, आजीवन कारावास अथवा विशेष परिस्थितियों में मृत्युदण्ड जैसी सजाएँ भी दे सकता है।
इस प्रकार जहाँ दीवानी विधि का स्वरूप उपचारात्मक (Remedial) है, वहीं आपराधिक विधि का स्वरूप मुख्यतः दण्डात्मक (Punitive) है।
प्रवाह-चित्र 3.1
विधिक अपकृत्य (Legal Wrong) का स्वरूप
विधिक अपकृत्य │ ┌──────────────┴──────────────┐ │ │ ▼ ▼ दीवानी अपकृत्य आपराधिक अपकृत्य │ │ ▼ ▼ दीवानी न्यायालय आपराधिक न्यायालय │ │ ▼ ▼ राहत (Relief) दण्ड (Punishment)
3.3 एक सरल उदाहरण
मान लीजिए राम ने श्याम को पाँच लाख रुपये उधार दिए। दोनों के बीच वैध संविदा (Valid Contract) हुई। निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी श्याम धन वापस नहीं करता।
क्या यह अपराध है?
सामान्यतः नहीं।
यह एक दीवानी विवाद है, क्योंकि यहाँ प्रश्न संविदा से उत्पन्न अधिकार के प्रवर्तन का है। ऐसी स्थिति में राम सक्षम दीवानी न्यायालय में धन-वसूली का वाद (Suit for Recovery of Money) दायर करेगा।
अब दूसरी स्थिति पर विचार कीजिए।
यदि श्याम रात के समय राम के घर में घुसकर पाँच लाख रुपये चोरी कर लेता है, तो स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। यहाँ विवाद किसी संविदा का नहीं, बल्कि एक अपराध का है। अब उद्देश्य केवल राम को धन दिलाना नहीं, बल्कि अपराधी को विधि के अनुसार दण्डित करना भी है।
इन दोनों उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि आर्थिक हानि दोनों स्थितियों में हुई है, किन्तु पहली स्थिति दीवानी विधि के अंतर्गत आती है जबकि दूसरी आपराधिक विधि के अंतर्गत।
दीवानी विधि और आपराधिक विधि में अंतर
| दीवानी विधि (Civil Law) | आपराधिक विधि (Criminal Law) |
|---|---|
| निजी अधिकारों की रक्षा करती है | समाज और राज्य की सुरक्षा करती है |
| वादी एवं प्रतिवादी के मध्य विवाद | राज्य बनाम अभियुक्त |
| राहत (Relief) प्रदान की जाती है | दण्ड (Punishment) दिया जाता है |
| सिविल प्रक्रिया संहिता लागू होती है | आपराधिक प्रक्रिया संहिता लागू होती है |
| प्रमाण का स्तर – संभावनाओं की प्रबलता (Preponderance of Probabilities) | प्रमाण का स्तर – संदेह से परे (Beyond Reasonable Doubt) |
विधिक दृष्टिकोण (Legal Insight)
यह समझना अत्यन्त आवश्यक है कि प्रत्येक गलत कार्य अपराध नहीं होता और प्रत्येक अपराध केवल आपराधिक परिणाम ही उत्पन्न नहीं करता। कई बार एक ही घटना से दीवानी तथा आपराधिक—दोनों प्रकार की कार्यवाहियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसा चेक जारी करता है जिसके खाते में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है, तो उसके विरुद्ध धन-वसूली के लिए दीवानी वाद भी दायर किया जा सकता है और परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कार्यवाही भी की जा सकती है।
अतः किसी घटना की विधिक प्रकृति (Legal Nature) को समझना प्रत्येक विधि-विद्यार्थी तथा न्यायिक अधिकारी के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
याद रखिए (Remember)
दीवानी विधि का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा करना है, जबकि आपराधिक विधि का उद्देश्य समाज की रक्षा करना है।
परीक्षा दृष्टि (Examination Insight)
प्रश्न: भारत में दीवानी वादों की प्रक्रिया किस संहिता द्वारा नियंत्रित होती है?
(a) भारतीय दण्ड संहिता
(b) भारतीय साक्ष्य अधिनियम
(c) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908
(d) भारतीय संविदा अधिनियम
सही उत्तर: (c) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908
अध्याय का सार (Chapter Summary)
इस अध्याय में हमने समझा कि प्रत्येक विधिक विवाद की प्रकृति समान नहीं होती। निजी अधिकारों से संबंधित विवाद दीवानी विधि के अंतर्गत आते हैं, जबकि समाज के विरुद्ध अपराध आपराधिक विधि के अंतर्गत। दोनों का उद्देश्य, प्रक्रिया, पक्षकार, प्रमाण का स्तर तथा परिणाम अलग-अलग होते हैं। यही कारण है कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 केवल दीवानी मामलों की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है और उसका आपराधिक मामलों पर कोई प्रत्यक्ष अनुप्रयोग नहीं है।
अगले अध्याय में हम दीवानी न्यायालय (Civil Court) की अवधारणा, उसकी संरचना (Hierarchy), अधिकारिता (Jurisdiction) तथा कार्यों का अध्ययन करेंगे। यही वह आधार है जिस पर आगे चलकर सिविल प्रक्रिया संहिता की सम्पूर्ण संरचना निर्मित होती है।

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